इतिहास

अनादि निधन प्रवाहमान दिगम्बर जैन धर्म की श्रमण संस्कृति आदर्श संस्कृति है ।

क्षेत्र परिचय

तीर्थंकर , चक्रवाती , कामदेव , तीन पद के धारी शांति प्रदाता , रिद्धि सिद्धि प्रदाता 16 वे तीर्थंकर भगवान्..

धर्मशाला

साधू संतों के आवास दान के लगभग चौबीस कमरों की यह विशाल दो मंजिल संतशाला स्थापित है |

इतिहास

अनादि निधन प्रवाहमान दिगम्बर जैन धर्म की श्रमण संस्कृति आदर्श संस्कृति है । साक्षात तीर्थंकरों की आराधना के साथ साथ स्थापना निक्षेप से प्रतिष्ठित जिंबिम्बों की साक्षात तीर्थंकर के समान आराधना करने की सम्यक परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है । इसके परिणाम स्वरूप नगर नगर , पर्वत पर्वत यथा योग्य दिगम्बर जैन श्रावक द्वारा जिन मंदिरों की स्थापना की जा रही है । वर्षों की आराधना एवं भक्ति के परिणाम से क्षेत्र चमत्कृत हो जाते हैं वह क्षेत्र अतिशय क्षेत्र के रूप में विख्यात हो जाते हैं । जब उस अतिशय की सुरभि चारों ओर फैलती है तो देश विदेश से लाखों श्रद्धालु आकर अतिशयता का लाभ लेते हैं । इसी श्रृंखला में बारहवीं शताब्दी के स्थापित आंवा के दोनों जैन मंदिर एवं अनेक अतिषयों से सम्पन्न महा अतिशयकारी गुफा में स्थित आंवा वाले बाबा श्री 1008 शांतिनाथ के अतिशय का लाभ लेने हेतु श्रद्धालु आकर पूजन , आरती, दीप चढ़ाकर अपनी आदि व्याधियां दूर कर मन वांछित फल पाते हैं ।

मुनि श्री ने अरावली पहाड़ियों के मध्य पहाड़ी पर स्थित नसियां के दर्शन कर इसकी दर्शनीयता को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र का नाम “श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन सुदर्शनोदय तीर्थक्षेत्र ” समाज की प्राथना पर घोषित किया ।
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श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन सुदर्शनोदय अतिशय क्षेत्र आंवा  

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